इस गर्मी की छुट्टी मम्मी
कुल्लू -शिमला घूमूँगा
नन्ही ट्रेन रेंगती होगी
सड़क घूमती बारिस होती
उस सुरंग से बाहर निकले
पर्वत घाटी देख देख मै
फूला नहीं समाऊंगा
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चीड़ कहीं तो देवदार हैं
हरे -भरे -सारे पौधे
रंग -बिरंगे फूल खिले हैं
कुदरत के प्यारे बच्चे
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चांदी चमके बर्फ लदी है
कुछ पल जा के बैठूँगा मै
शीत नदी संग कान उघारे
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झरने झर झर मोहे मन को
मुक्त बहें- कल-कल वो करते
बादल उड़ते संग -संग खेलें
स्वर्ग मजा देते- मन मेरे
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बर्फ में दौडूँ -खेलूँगा मै
स्केटिंग कर आऊँगा
चिड़िया बन्दर नए नज़ारे
फोटो सभी उतारूंगा
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इन नदिया झरने सा अम्मा
मन कहता बहता मै जाऊं
हर आँखों में -हर मन में माँ
बसकर- खींच उन्हें मै लाऊं
पर्वत –घाटी- इस हरियाली
अमृत रस --के मीठे पानी
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तप्त ह्रदय भटके भूले जो
कंटक पथ ही वास किये हैं
कोमल नन्हे कर से अपने
उनका माथा मै सहलाऊँ
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शीत वायु सा -हिम-हिमगिरी सा
कल -कल करती -निश्छल नदिया- सा
शीतल मन उनका मै करके
छाती तेरी सदा जुड़ाऊँ !!
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
२३.०६.२०११ जल पी बी
५.०९ पूर्वाह्न
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बच्चे मन के सच्चे हैं फूलों जैसे अच्छे हैं मेरी मम्मा कहती हैं तुझसे जितने बच्चे हैं सब अम्मा के प्यारे हैं --


