इतनी ढेर किताबें देखो
बस्ता मेरा ढोता
धूप से इनको यही बचाए
बारिस - छाता- होता
कविता रुचिकर देख किताबें
बड़े मजे से ढोता
लेकिन गणित और विज्ञान की
मोटी मोटी देख किताबें
मन में जैसे ये रोता
जिस दिन छुट्टी हो जाती है
दौड़ा-आ -घर में सोता
मेरे बस्ते पर एक कंगारू
हिरन व् हाथी लदा हुआ
बस्ता सब से प्यार है करता
कभी न बोले - हटो जरा !!
( ALL THE PHOTOS TAKEN WITH THANKS FROM GOOGLE/NET)
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
२६.०६.२०११ जल पी बी
बच्चे मन के सच्चे हैं फूलों जैसे अच्छे हैं मेरी मम्मा कहती हैं तुझसे जितने बच्चे हैं सब अम्मा के प्यारे हैं --

